अध्याय पहिला

अर्जुन विषाद योग
श्रीगणेशाय नमः। ॐ नमो जी आद्या। वेदप्रतिपाद्या। जय जय स्वसंवेद्या। आत्मरुपा॥ १॥ देवा तूंचि गणेशु। सकलमतिप्रकाशु। म्हणे निवृत्तिदासु। अवधारिजो जी॥२॥ हें शब्दब्रह्म अशेष। तेचि मूर्ति सुवेष। तेथ वर्णवपु निर्दोष। मिरवत असे॥३॥ स्मृति तेचि अवयव। देखा अंगीकभाव। तेथ लावण्याची ठेव। अर्थशोभा॥४॥ अष्टादश पुराणें। तींचि मणिभूषणें। पदपध्दती खेवणें। प्रमेयरत्नांची॥५॥ पदबंध नागर। तेंचि रंगाथिलें अंबर। जेथ साहित्य वाणे सपूर। उजाळाचें॥६॥ देखा काव्यनाटका। जें निर्धारितां सकौतुका। त्याचि रुणझुणती क्षुद्रघंटिका। अर्थध्वनि॥७॥ नाना प्रमेयांची परी। निपुणपणें पाहतां कुसरी। दिसती उचित पदें माझारीं। रत्ने भलीं॥८॥ तेथ व्यासादिकांचिया मती। तेचि मेखळा मिरवती। चोखाळपणें झळकती। पल्लवसडका॥९॥ देखा षड्दर्शनें म्हणिपती। तेचि भुजांची आकृती। म्हणौनि विसंवादें धरिती। आयुधें हातीं॥१०॥ 

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